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एमआरटीएस की जरूरत | इतिहास

इतिहास

दिल्ली 1911 में तब भारत सरकार की राजगद्दी बनी जब तत्कालीन अंग्रेजी हुकुमत ने अपनी राजधानी कलकत्ता से दिल्ली बदली। शुरू में राजधानी प्राचीर नगल दिल्ली के उत्तर में रिज में स्थित थी। चूंकि यह स्थान सरकार की राजगद्दी के लिए उचित नहीं पाया गया इसलिए एक नया शहर अर्थात् प्राचीर शहर के दक्षिण में स्थित नई दिल्ली की योजना बनाई गई। नई दिल्ली का निर्माण कार्य प्रख्यात शहर योजनाकार और वास्तुकार सर एडविन लुटियंस और सर हर्बर्ट बेकर के पर्यवेक्षण में 1912 में आरंभ हुआ। नई दिल्ली का निर्माण 1931 में पूरा हुआ तब सरकार अपनी गद्दी इस नए स्थान पर ले आई थी। तब से इस शहर का तेजी से विकास होता जा रहा है।

आज, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली का क्षेत्रफल 1496 वर्ग किलोमीटर है और यह राज्य सरकार की सभी शक्तियों के साथ संघीय क्षेत्र है। दिल्ली के लिए मेट्रो परियोजना की योजना सातवें दशक से बननी शुरू हुई थी। केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीआरआरआई) ने 1969-70 में दिल्ली के परिवहन और यात्रा विशेषताओं पर पहली बार व्यापक अध्ययन किया। परिवहन और यात्रा विशेषताओं का उल्लेख करने वाले व्यापक डेटा प्रकाशित करते हुए इसने यात्रा मांग को दर्शाते हुए गणितिय मॉडलों को विकसित किया। अनेक विकल्पों की जांच करते हुए, इसने दिल्ली के लिए मास रैपिड ट्रांजिट नेवटर्क की सिफारिश की। भारतीय रेलवे के मेट्रोपोलिटन ट्रांसपोर्ट टीम (एमटीटी) ने उपरोक्त योजना की समीक्षा की। एमटीटी ने सीआरआरआई की सिफारिशों पर कुछ संशोधन करने की मांग की और भारत की राजधानी शहर के लिए एक सुव्यवस्थित मास रैपिड ट्रांजिट प्रणाली की योजना बनाई। इस प्रणाली में दो अक्षीय उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम कोरिडोरों की सीध में 36 कि.मी. भूमिगत कोरिडोर और 96 किमी धरातल रेल कोरिडोर शामिल थे। मेट्रोपोलिटन ट्रांसपोर्ट परियोजना (एमटीपी-आर, जो कि भारत सरकार के रेल मंत्रालय द्वारा गठित किया गया था) ने एमटीआर प्रणाली के निर्माण के लिए एक इंजीनियरिंग योजना तैयार की।

चूंकि सीआरआरआई का प्रस्ताव वर्ष 1981 तक की अनुमानित परिवहन मांग पर आधारित था, यह कार्य अर्थात् वर्ष 2001 तक परिवहन मांग का आगे अनुमान लगाने का कार्य टाउन एंड कंटरी प्लानिंग संगठन को सौंपा गया। इसने 58 किमी भूमिगत और 195 धरातलीय कोरिडोरों के नेटवर्क की अवधारणा योजना तैयार की। तकनीकी-आर्थिक संभाव्यता, अध्ययन के रूप में, चार विशेष मुख्य मार्गों और विद्यमान रेलवे ट्रैकों के किनारे अवमृदा परीक्षण किए गए और प्रायोगिक परियोजनाओँ को शुरू करने की सिफारिश की गई।

दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने 1984 में दिल्ली के लिए भावी योजना (एमपीडी-2001) तैयार की और इसने बुहमॉडल परिवहन प्रणाली की सिफारिश की जिसमें 200 किमी की लाइट रेल ट्रांजिट प्रणाली, 10 किमी की ट्रामवे जो कि धरातलीय रेल प्रणाली का विस्तार है और व्यापक सड़क नेटवर्क शामिल है। शहरी कला आयोग ने डीडीए के प्रस्ताव में कुछ संशोधनों की मांग की और त्रिमार्गी भूमिगत एमआरटी कोरिडोरों के साथ विद्यमान रिंग रेलवे के विकास का सुझाव दिया।

 

विशेषकर शहर के पश्चिमी और पूर्वी भाग में तेजी से विकास होने के कारण भारत सरकार के रेल मंत्रालय ने एक अध्ययन ग्रुप को नियुक्त किया जो पूर्व-पश्चिम कोरिडोर को मिलाने वाले स्पष्ट मार्ग की सिफारिश करें तथा सही निर्माण प्रौद्योगिकी के विकल्प का आंकलन करने के लिए 1987 में एक और कृतिक बल को नियुक्त किया। जबकि इसने अध्ययन ग्रप के द्वारा तैयार मार्ग में कुछ बदलावों का सुझाव दिया, इसने लाइट रेल ट्रांजिट प्रणाली द्वारा प्रतिस्थापन हेतु दिए सुझाव के अस्वीकार होने की स्थिति में एम-बाहन मैगनेटिक लेविएशन सिस्टम पर प्रायोगिक परियोजना की सिफारिश की।

आरआईटीईएस द्वारा तैयार समेकित मल्टी मॉडल मास रैपिड ट्रांसपोर्ट सिस्टम ऑफ दिल्ली (आईएमएमआरटीएस) के संबंध में संभाव्यता रिपोर्ट में कुल 184.5 किमी रेल कोरिडोर, मेट्रो कोरिडोर और समर्पित बस मार्ग वाली तीन-अवयवी प्रणाली की सिफारिश की गई हैं तथा उसमें बाद में 14 किमी और बढ़ाकर 195.5 किमी किया गया। कुल नेटवर्क में 16 खंड शामिल हैं जिसे प्रत्येक खंड की प्रति किमी लंबाई के हिसाब से यात्री किमी के आधार पर क्रम के कार्यान्वित किया जाएगा। नेटवर्क के प्रथम चरण अब (चालू) में 13.01 किमी भूमिगत अर्थात् मेट्रो कोरिडोर और 52.10 किमी धरातलीय/उत्थापन अर्थात् रेल कोरिडोर के सहित 65.11 किमी मार्ग लंबाई है।